परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (किं स्वित्) क्यों [किस कर्मफल से] (नः) हमें (राजा) राजा [परमेश्वर] ने (जगृहे) ग्रहण किया है [सुख दिया है], (कत्) कब (अस्य) इस [परमात्मा] के (व्रतम्) नियम को (अति चकृम)हमने उल्लङ्घन किया है [जिस से क्लेश पाया है], (कः) प्रजापति परमेश्वर [इस को] (वि) विविध प्रकार (वेद) जानता है। (हि) क्योंकि (मित्रः) सबका मित्र [परमात्मा] (चित्) ही (स्म) अवश्य (देवान्) उन्मत्तो को (जुहुराणः) मरोड़ देनेवाला और (याताम्) गतिशीलों [पुरुषार्थियों] का (अपि) ही (श्लोकः न) स्तुति के समान (वाजः) बल (अस्ति) है ॥३३॥
भावार्थभाषाः - पूर्वजन्म के फल कीव्यवस्था को, जो हमारे अकस्मात् सुख-दुःख का कारण है, परमेश्वर जानता है, परन्तुवह अपनी न्यायव्यवस्था से उन्मत्त आलसियों को कष्ट और उद्योगियों को सुख देताहै ॥३३॥मन्त्र ३३-३६ ऋग्वेद में हैं−१०।१२।५-३८ ॥