परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) जब कि (देवस्य)प्रकाशमय परमेश्वर का (अमृतम्) अमृत [जीवन सामर्थ्य] (गोः) पृथिवी के लिये (स्वावृक्) सहज में पाने योग्य है, (अतः) इसी [जीवन सामर्थ्य] से (जातासः)उत्पन्न हुए प्राणी (उर्वी) पृथिवी पर (धारयन्ते) [अपने को] रखते हैं। हेपरमात्मन् ! (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (ते) तेरे (तत्) उस (यजुः अनु)पूजनीय कर्म के पीछे (गुः) चलते हैं, (यत्) क्योंकि (एनी) चलनेवाली भूमि (दिव्यम्) श्रेष्ठ (घृतम्) सारयुक्त (वाः) वरणीय उत्तम पदार्थ (दुहे) भरपूरकरती है ॥३२॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्राणियोंके पालन के लिये पृथिवी पर प्रकाश, वायु, जल, अन्न आदि अनेक पदार्थ स्वयं पानेयोग्य बनाये हैं, सब विद्वान् लोग परमेश्वर के नियमों को समझ कर संसार में अनेकलाभ उठाते हैं ॥३२॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।१२।३ ॥