परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (घृतस्नू) हे जलसमान [व्यवहार को] शुद्ध करनेवाले ! [दोनों माता-पिता] (वर्धाय) [अपने] बढ़ने के लिये (वाम्) तुम दोनों के (अपः) कर्म की (अर्चामि) मैं पूजा करता हूँ, (रोदसी) हेव्यवहार की रक्षक ! [दो प्रजाओ] तुम (द्यावाभूमी) सूर्य और भूमि [के समान उपकारीहोकर] (मे) मेरी (शृणुतम्) सुनो। (यत्) क्योंकि (अहा) दिन और (देवाः) गतिमान्लोक (असुनीतिम्) प्राणदाता [परमात्मा] को (आयन्) प्राप्त होते हैं, (अत्र) यहाँ [संसार में] (नः) हमें (पितरा) माता-पिता [आप दोनों] (मध्वा) ज्ञान से (शिशीताम्) तीक्ष्ण करें ॥३१॥
भावार्थभाषाः - जो माता-पिता आदिपूजनीय विद्वानों के कर्मो से और संसार के विविध पदार्थों से परमेश्वर का ज्ञानप्राप्त करते हैं, वे ही महाज्ञानी होते हैं ॥३१॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेदमें है−१०।१२।४ ॥