वांछित मन्त्र चुनें

अन्व॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्य॒दन्वहा॑नि प्रथ॒मो जा॒तवे॑दाः। अनु॒ सूर्य॑ उ॒षसो॒अनु॑ र॒श्मीननु॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनु । अग्नि: । उषसाम् । अग्रम् । अख्यत् । अनु । अहानि । प्रथम: । जातऽवेदा: । अनु । सूर्य: । उषस: । अनु । रश्मीन् । अनु । द्यावापृथिवी इति । आ । विवेश ॥१.२७॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:27


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) सर्वव्यापकपरमेश्वर ने (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) विकाश को (अनु) निरन्तर, [उसी] (प्रथमः)सबसे पहिले वर्तमान (जातवेदाः) उत्पन्न वस्तुओं के ज्ञान करानेवाले परमेश्वर ने (अहानि) दिनों को (अनु) निरन्तर (अख्यत्) प्रसिद्ध किया है। (सूर्यः) [उसी]सूर्य [सब में व्यापक वा सबको चलानेवाले परमेश्वर] ने (उषसः) उषाओं में (अनु)लगातार, (रश्मीन्) व्यापक किरणों में (अनु) लगातार, (द्यावापृथिवी) सूर्य औरपृथिवी में (अनु) लगातार (आविवेश) प्रवेश किया है ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जिस परमेश्वर नेसूक्ष्म और स्थूल पदार्थों को रचकर सबको अपने वश में कर रक्खा है, वही सबमनुष्यों का उपास्य है ॥२७॥मन्त्र २७, २८ आ चुके हैं-अ० ७।८२।४, ५ ॥मन्त्र २७ काप्रथम पाद ऋग्वेद में है−४।१३।१ ॥
टिप्पणी: २७−मन्त्रौ २७, २८ पूर्वत्र व्याख्यातौ-अ०७।८२।४, ५ ॥