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ब॒तो ब॑तासि यम॒नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदा॒म। अ॒न्या किल॒ त्वां क॒क्ष्येव यु॒क्तं परि॑ष्वजातौ॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बत: । बत । असि । यम । न । एव । ते । मन: । हृदयम् । च । अविदाम । अन्या । किल । त्वाम् । कक्ष्याऽइव । युक्तम् । परि । स्वजातै । लिबुजाऽइव । वृक्षम् ॥१.१५॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:15


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (बत) हा ! (यम) हे यम ! [जोड़िया भाई] तू (बतः) बड़ा निर्बल (असि) है, (ते) तेरे (मनः) मन [संकल्प] को (च) और (हृदयम्) हृदय [निश्चय] को (एव) निःसन्देह (न अविदाम) हम ने नहीं पाया। (अन्या) दूसरी स्त्री (किल) अवश्य (त्वाम्) तुझ से (परि ष्वजातै) आलिङ्गन करेगी, (कक्ष्या इव) जैसे घोड़े की पेटी (युक्तम्) कसे हुए [घोड़े] से और (लिबुजा इव)जैसे बेल [लता] (वृक्षम्) वृक्ष से [लिपट जाती है] ॥१५॥
भावार्थभाषाः - स्त्री का वचन है। भाई ! मैंने तुझे इतना समझाया पर तूने मेरी बात न मानी, अवश्य मुझ से दूसरी स्त्रीतेरे साथ विवाह कर के सुख भोगेगी ॥१५॥मन्त्र १५ और १६ कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१०।१३, १४ ॥
टिप्पणी: १५−(बतः) वन उपकारे उपतापे च-क्त। बतो बलादतीतो भवतिदुर्बलः-निरु० ६।२८। अतिनिर्बलः (बत) शोके। हा (असि) (यम) म० ८। हे यमजभ्रातः (न) निषेधे (एव) निश्चयेन (ते) तव (मनः) चित्तम् संकल्पम् (हृदयम्) अन्तःकरणम्।निश्चयम् (च) (अविदाम) विद् लाभे-लुङ्। वयं प्राप्तवत्यः (अन्या) मद्भिन्नास्त्री (किल) प्रसिद्धौ (त्वाम्) (कक्ष्या) अश्वस्य कक्षप्रदेशस्था रज्जुः (इव)यथा (युक्तम्) गमनाय योजितमश्वम् (परिष्वजातै) आलिङ्गेत् (लिबुजा) अ० ६।८।१। लता (वृक्षम्) तरुम् ॥