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रात्री॑भिरस्मा॒अह॑भिर्दशस्ये॒त्सूर्य॑स्य॒ चक्षु॒र्मुहु॒रुन्मि॑मीयात्। दि॒वा पृ॑थि॒व्यामि॑थु॒ना सब॑न्धू य॒मीर्य॒मस्य॑ विवृहा॒दजा॑मि ॥

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पद पाठ

रात्रीभि: । अस्मै । अहऽभि: । दशस्येत् । सूर्यस्य । चक्षु: । मुहु: । उत् । मिमीयात् । दिवा । पृथिव्या । मिथुना । सबन्धू इति सऽबन्धू । यमी: । यमस्य । विवृहात् । अजामि ॥१.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (रात्रीभिः) रात्रियोंके साथ और (अहभिः) दिनों के साथ (अस्मै) इस [भाई] को (सूर्यस्य) सूर्य की (चक्षुः) ज्योति (दशस्येत्) [सुमति] देवे और (मुहुः) बारम्बार (उत् मिमीयात्)फैली रहे। (दिवा) सूर्य के साथ और (पृथिव्या) पृथिवी के साथ (मिथुना) जोड़ा-जोड़ा (सम्बन्धू) भाई के साथवाले हैं, [फिर] (यमीः) जोड़िया बहिन (यमस्य)जोड़िया भाई के (अजामि) बिना सम्बन्ध से (विवृहात्) उद्यम करे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - स्त्री का वचन है। हेभाई ! सूर्य के प्रकाश में आँख खोल कर देख कि राति और दिन बहिन-भाई होकर पति-पत्नी भाव से रहते हैं और सूर्य और पृथिवी के बीच सब पदार्थों में भी यहीसम्बन्ध है, फिर मैं भी बहिन होकर अपने भाई से ही विवाह करूँ ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(रात्रीभिः) (अस्मै) यमाय (अहभिः) अहोभिः। दिनैः (दशस्येत्) दद्यात् सुमतिम् (सूर्यस्य) (चक्षुः) प्रकाशकं तेजः (मुहुः) बारम्बारम् (उन्मिमीयात्) माङ् माने, परस्मैपदंछान्दसम्। ऊर्ध्वं मानं गमनं कुर्यात् (दिवा) सूर्येण सह (पृथिव्या) भूम्या सह (मिथुना) स्त्रीपुरुषयोर्युग्मे। द्वन्द्वे (सबन्धू) बन्धुना भ्रात्रा सहिते (यमीः) विसर्गश्छान्दसः-म० ८। यमी। एकगर्भजायमाना यमजा भगिनी (यमस्य) म० ८।एकगर्भजायमानस्य यमजस्य। भ्रातुः (वि वृहात्) वृहू उद्यमने। विविधं यत्नंकुर्यात् (अजामि) अजामित्वेन। सम्बन्धराहित्येन ॥