भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ओ) ओ ! [हे पुरुष !] (सखायम्) [तुझ] मित्र को (चित्) ही (सख्या) मित्रता के साथ (ववृत्याम्) मैं [स्त्री] प्रवृत्त करूँ-(पुरु चित्) बहुत ही प्रकार से (अर्णवम्) विज्ञानयुक्तशास्त्र को (तिरः जगन्वान्) पार जा चुकनेवाले, (प्रतरम्) बहुत अधिक (दीध्यानः)प्रकाशमान, (वेधाः) बुद्धिमान् आप (पितुः) [अपने] पिता के (नपातम्) नाती [पौत्र]को (क्षमि अधि) पृथिवी पर (आ दधीत) धारण करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - यह मन्त्र स्त्री कावचन है। हम दोनों बड़े प्रेमी हैं, तू वेद आदि शास्त्रों का जाननेवालाबुद्धिमान् पुरुष है, ऐसा प्रयत्न किया जावे कि हम दोनों के सम्बन्ध से उत्तमसन्तान उत्पन्न हो ॥१॥इस सूक्त के मन्त्र १-१६ में यमी-यम अर्थात् जोड़िया बहिनऔर भाई के संवाद वा प्रश्न-उत्तर की रीति से यह बताया है कि वे दोनों बहिन-भाईहोकर परस्पर विवाह कभी न करें, किन्तु बहिन भाई से अन्य पुरुष के साथ और भाईबहिन से दूसरी स्त्री के साथ विवाह करे ॥मन्त्र १-५। अभेद वा भेद से ऋग्वेद मेंहैं- १०।१०।१-५ ॥