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सू॑र्यनावमारुक्षः श॒तारि॑त्रां स्व॒स्तये॑। रात्रिं॒ मात्य॑पीप॒रोऽहः॑ स॒त्राति॑पारय ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सूर्य । नावम् । आ । अरुक्ष: । शतऽअरित्राम् । स्वस्तये । रात्रिम् । मा । अति । अपीपर: । अह: । सत्रा । अति । पारय ॥१.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:17» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आयु की बढ़ती के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्य) हे सूर्य ! [सबके चलानेवाले जगदीश्वर] (स्वस्तये) [हमारे] आनन्द के लिये (शतारित्राम्)सैकड़ों डाड़ोंवाली (नावम्) नाव पर (आ अरुक्षः) तू चढ़ा है। (मा) मुझ से (रात्रिम्) रात्रि को (अति अपीपरः) तूने सर्वथा पार कराया है, (अहः) दिन (सत्रा)भी (अति पारय) सर्वथा तू पार करा ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जो जगदीश्वर इस संसारको विविध प्रकार चला रहा है, मनुष्य उसकी महती कृपा से रात्रि का कर्त्तव्य पूराकरके दिन का कर्त्तव्य पूरा करने का उद्योग करें, और इस मन्त्र से प्रातःकाल मेंप्रार्थना करें ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(सूर्य) हे सर्वप्रेरक जगदीश्वर (रात्रिम्) रात्रिकर्त्तव्यम् (अहः) दिनकर्त्तव्यम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० २५॥