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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु की बढ़ती के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्तंयते) अस्त होतेहुए [परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार है, (अस्तमेष्यते) अस्त होना चाहनेवाले को (नमः) नमस्कार है, (अस्तमिताय) अस्त हो चुके हुए को (नमः) नमस्कार है। (विराजे)विविध राजा को (नमः) नमस्कार है, (स्वराजे) अपने आप राजा को (नमः) नमस्कार है, (सम्राजे) सम्राट् [राजराजेश्वर] को (नमः) नमस्कार है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा एक सृष्टि औरप्रलय की सन्धि दशा में, दूसरे प्रलय करने की दशा में और तीसरे प्रलय की समाप्तिमें विविध प्रकार अपनी महिमा दिखाता है, उसी सर्वशक्तिमान् सम्राट् की आज्ञा मानकर हम सदा सुखी रहें ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(अस्तंयते) अस्तंगच्छते परमेश्वराय (नमः) नमस्कारः (अस्तमेष्यते)अस्तं गमिष्यते (अस्तमिताय) अस्तं प्राप्ताय। अन्यत् पूर्ववत्-म० २२॥
