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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु की बढ़ती के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (शुक्रः) शुद्ध [स्वच्छ निर्मल] (असि) है, तू (भ्राजः) प्रकाशमान (असि) है। (सःत्वम्) सो तू (यथा) जैसे (भ्राजता) प्रकाशमान स्वरूप के साथ (भ्राजः) प्रकाशमान (असि) है, (एव) वैसे ही (अहम्) मैं (भ्राजता) प्रकाशमान स्वरूप के साथ (भ्राज्यासम्) प्रकाशमान रहूँ ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जगदीश्वर के प्रकाशस्वरूप का ध्यान करके मनुष्य विद्या आदि उत्तम गुणों से संसार में तेजस्वी होवें॥२०॥
टिप्पणी: २०−(शुक्रः) शुक्लः। शुद्धः (असि) (भ्राजः) भ्राजृ दीप्तौ-पचाद्यच्।प्रकाशमानः (असि) (सः) तादृशः (यथा) येन प्रकारेण (त्वम्) (भ्राजता) प्रकाशमानेनस्वरूपेण (भ्राजः) प्रकाशमानः (असि) (एवम्) (अहम्) उपासकः (भ्राजता) दीप्यमानेनस्वरूपेण (भ्राज्यासम्) दीपिषीय ॥
