0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सुख की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) यह (अग्निः)ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (आह) कहता है, (तत् उ) यही (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (आह) कहता है, (पूषा) पोषण करनेवाला जगदीश्वर (मा) मुझे (सुकृतस्य) पुण्य कर्मके (लोके) लोक [समाज] में (धात्) रक्खे ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा निरन्तरआज्ञा देता है कि मनुष्य सदा धर्मात्माओं के समाज में रह कर उन्नति करे ॥२॥इसमन्त्र का कुछ भाग आ चुका है-अ० ८।५।५ ॥
टिप्पणी: २−(तत्) इदम् (अग्निः)ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (आह) ब्रवीति। उपदिशति (तत्) (उ) एव (सोमः) सर्वोत्पादकःपरमात्मा (आह) (पूषा) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा) माम् (धात्) दध्यात् (सुकृतस्य)पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे ॥
