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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सुख की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (जितम्) जय किया हुआवस्तु (अस्माकम्) हमारा और (उद्भिन्नम्) निकासी किया हुआ धन (अस्माकम्) हमारा [हो], (विश्वाः) [शत्रुओं की] सब (पृतनाः) सेनाओं और (अरातीः) कंजूसियों को (अभिअस्थाम्) मैंने रोक दिया है ॥१॥
भावार्थभाषाः - पराक्रमी वीर पुरुषशत्रुओं को जीतकर और उन से कर लेकर अपने वश में रक्खे ॥१॥यह मन्त्र आचुका है-अ०१०।५।३६ ॥
टिप्पणी: १−(जितम्) जयेन प्राप्तम् (अस्माकम्) धर्मात्मनाम् (उद्भिन्नम्)उद्भेदनं स्फुरणम्। आयधनम् (अस्माकम्) (अभि अस्थाम्) अभिभूतवानस्मि (विश्वाः)सर्वाः (पृतनाः) शत्रुसेनाः (अरातीः) अदानशीलताः ॥
