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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस [कुमार्गी]के (इदम्) अब (वर्चः) प्रताप, (तेजः) तेज, (प्राणम्) प्राण और (आयुः) जीवन को (नि वेष्टयामि) मैं लपेटे लेता हूँ, (इदम्) अब (एनम्) इस [कुमार्गी] को (अधराञ्चम्) नीचे (पादयामि) लतियाता हूँ ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् धर्मवीर राजासुवर्ण आदि धन और सब सम्पत्ति का सुन्दर प्रयोग करे और अपने प्रजागण और वीरों कोसदा प्रसन्न रख कर कुमार्गियों को कष्ट देकर नाश करे ॥१-४॥
टिप्पणी: १−आगे के सब मन्त्रोंका भावार्थ इस भावार्थ के समान है ॥ २−मन्त्र १, २, ४ कुछ भेद आ चुके हैं-अ०१०।५।३६ ॥४−(तस्य) कुमार्गणः पुरुषस्य (इदम्) इदानीम् (वर्चः) प्रतापम् (तेजः)प्रकाशम् (प्राणम्) श्वासव्यापारम् (आयुः) जीवनम् (नि) नितराम् (वेष्टयामि)आच्छादयामि (इदम्) इदानीम् (एनम्) कुमार्गिणम् (अधराञ्चम्) अधोगतम् (पादयामि)पादेन प्रहरामि ॥
