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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [कुमार्गी] (मृत्योः) मृत्यु की (पड्वीशात्) बेड़ी के प्रवेशवाले (पाशात्) बन्धन से (मामोचि) न छूटे ॥३२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् धर्मवीर राजासुवर्ण आदि धन और सब सम्पत्ति का सुन्दर प्रयोग करे और अपने प्रजागण और वीरों कोसदा प्रसन्न रख कर कुमार्गियों को कष्ट देकर नाश करे॥३२॥
टिप्पणी: ३२−(मृत्योः) मरणस्य (पड्वीशात्) अ० ६।९६।२। सर्त्तेरटिः। उ० १।१३४। पश बन्धने-अटि, डित्+विशप्रवेशे-क, दीर्घः। पाशप्रवेशयुक्तात्। अन्यत् पूर्ववत्-म० १-४ ॥
