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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मात्) उस [पद] से (अमुम्) अमुक, (अमुम्) अमुक पुरुष, (आमुष्यायणम्) अमुक पुरुष के सन्तान, (अमुष्याः) अमुक स्त्री के (पुत्रम्) पुत्र को (निः भजामः) हम भागरहित करते हैं, (असौ यः) वह जो [कुमार्गी] है ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् धर्मवीर राजासुवर्ण आदि धन और सब सम्पत्ति का सुन्दर प्रयोग करे और अपने प्रजागण और वीरों कोसदा प्रसन्न रख कर कुमार्गियों को कष्ट देकर नाश करे ॥१-४॥
टिप्पणी: २−(तस्मात्)प्रसिद्धात्, पदात् (अमुम्) अमुकपुरुषम् (अमुम्) अमुकपुरुषम् (निर्भजामः)भागरहितं कुर्मः (आमुष्यायणम्) अमुकपुरुषस्य सन्तानम् (अमुष्याः) अमुकस्त्रियाः (पुत्रम्) सुतम् (असौ) (यः) कुमार्गी पुरुषः ॥
