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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इदम्) अब (अहम्) मैं (आमुष्यायणे) अमुक पुरुष के सन्तान, (अमुष्याः) अमुक स्त्री के (पुत्रे) [कुमार्गी] पुत्र पर (दुःष्वप्न्यम्) दुष्ट स्वप्न [आलस्य आदि] में उठे कुविचारको (मृजे) शोधता हूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्मा दूरदर्शीलोग कुमार्गी जन के कुल, माता, पिता आदि का पता लगाकर यथोचित दण्ड देवें ॥७, ८॥
टिप्पणी: ८−(इदम्) इदानीम् (अहम्) धर्मात्मा (आमुष्यायणे) अमुष्य पुरुषस्य सन्ताने (अमुष्याः) अमुकस्त्रियाः (पुत्रे) कुमार्गिणि सन्ताने (दुःष्वप्न्यम्)दुष्टस्वप्ने भवं कुविचारम् (मृजे) शोधयामि ॥
