पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुयामन्) हे सुमार्गी ! (चाक्षुष) हे नेत्रवाले ! [विद्वान्] ॥७॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्मा दूरदर्शीलोग कुमार्गी जन के कुल, माता, पिता आदि का पता लगाकर यथोचित दण्ड देवें ॥७, ८॥
टिप्पणी: ७−(सुयामन्) यागतौ-मनिन्। हे सुमार्गिन् (चाक्षुष) हे नेत्रवन्। दूरदर्शिन् ॥
