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निर्द्वि॒षन्तं॑दि॒वो निः पृ॑थि॒व्या निर॒न्तरि॑क्षाद्भजाम ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि: । द्विषन्तम् । दिव: । नि: । पृथिव्या: । नि: । अन्तरिक्षात् । भजाम ॥७.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शत्रु के नाश करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (द्विषन्तम्) वैरकरनेवाले [कुमार्गी] को (दिवः) आकाश से (निः) पृथक्, (पृथिव्याः) पृथिवी से (निः) पृथक् और (अन्तरिक्षात्) मध्यलोक से (निः भजाम) हम भागरहित करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - शूर धर्मात्मा लोगदुराचारियों को आकाशमार्ग, पृथिवीमार्ग और अन्य मार्ग से सर्वथा निकाल देवें॥६॥
टिप्पणी: ६−(निः) पृथक् (द्विषन्तम्) वैरयन्तम् (दिवः) आकाशात् (निः) (पृथिव्याः)भूलोकात् (अन्तरिक्षात्) मध्यलोकात् (निर्भजाम) भागरहितं कुर्याम ॥