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वै॑श्वान॒रस्यै॑नं॒ दंष्ट्र॑यो॒रपि॑ दधामि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वैश्वानरस्य । एनम् । दंष्ट्रयो: । अपि । दध्यामि ॥७.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शत्रु के नाश करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) इस [कुमार्गी]को (वैश्वानरस्य) सब नरों के हितकारी पुरुष के (दंष्ट्रयोः) दोनों डाढ़ों के बीच [जैसे अन्न को] (अपि) अवश्य (दधामि) धरता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण कुकर्मी जन कोपकड़कर सबके हित के लिये राजा को देवें, वह उसे ऐसा नष्ट करे, जैसे अन्न को डाढ़ीसे कुचलते हैं ॥३॥यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है-अ० ४।३६।२ ॥
टिप्पणी: ३−(वैश्वानरस्य)सर्वनरहितस्य पुरुषस्य (एनम्) कुमार्गिणम् (दंष्ट्रयोः)दन्तपङ्क्तिविशेषयोर्मध्ये (अपि) अवश्यम् (दधामि) धरामि ॥