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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) इस [कुमार्गी]को (देवानाम्) [परमात्मा के] उत्तम नियमों के (घोरैः) घोर [भयानक] और (क्रूरैः)क्रूर [निर्दय] (प्रैषैः) शासनों से (अभिप्रेष्यामि) मैं सामने से प्राप्त होताहूँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - दुराचारी लोग परमात्माके नियमों से घोर क्रूर क्लेशों में पड़ते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(देवानाम्) ईश्वरस्यदिव्यनियमानाम् (एनम्) कुमार्गिणम् (घोरैः) भयानकैः (क्रूरैः) दयारहितैः (प्रैषैः) प्र+इष वाञ्छायां गतौ च-घञ्। शासनैः (अभिप्रेष्यामि) आभिमुख्येनप्राप्नोमि ॥
