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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [कुमार्गी] (मा जीवीत्) न जीता रहे, (तम्) उसको (प्राणः) प्राण (जहातु) छोड़ देवे ॥१३॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी राजादुराचारियों को सर्वथा नाश करके प्रजापालन करे ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(सः) दुष्टः (मा जीवीत्)नैव प्राणान् धारयेत् (तम्) दुष्टम् (प्राणः) जीवनम् (जहातु) त्यजतु ॥
