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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) उस [कुमार्गी]को (जहि) नाश करदे, (तस्य) उसकी (पृष्टीः) पसलियाँ (अपि) सर्वथा (शृणीहि) तोड़डाल, (तेन) उस [शूर कर्म] से (मन्दस्व) तू चल ॥१२॥
भावार्थभाषाः - बुद्धिमान् शूर लोगदुष्टों को नाश करके सदा आगे बढ़ते रहें ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(तम्) कुमार्गिणम् (जहि) नाशय (तेन) शूरकर्मणा (मन्दस्व) मदि स्तुतिगत्यादिषु। गच्छ (तस्य) दुष्टस्य (पृष्टीः) पार्श्वास्थीनि (अपि) सर्वथा (शृणीहि) विदारय ॥
