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तेनै॑नंविध्या॒म्यभू॑त्यैनं विध्यामि॒ निर्भू॑त्यैनं विध्यामि॒ परा॑भूत्यैनं विध्यामि॒ग्राह्यै॑नं विध्यामि॒ तम॑सैनं विध्यामि ॥

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पद पाठ

तेन । एनम् । विध्यामि । अभूत्या । एनम् । विध्यामि । नि:ऽभूत्या । एनम् । विध्यामि । पराऽभूत्या । एनम् । विध्यामि । ग्राह्या । एनम् । विध्यामि । तमसा । एनम् । विध्यामि ॥७.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शत्रु के नाश करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तेन) उस [ईश्वरनियम]से (एनम्) इस [कुमार्गी] को (अभूत्या) अभूति [असम्पत्ति] से (विध्यामि) मैंछेदता हूँ, (एनम्) इस को (निर्भूत्या) निर्भूति [हानि वा नाश] से (विध्यामि)छेदता हूँ, (एनम्) इस को (पराभूत्या) पराभूति [पराभव, हार] से (विध्यामि) छेदताहूँ, (एनम्) इस को (ग्राह्या) गठिया रोग से (विध्यामि) छेदता हूँ, (एनम्) इस को (तमसा) अन्धकार [महाक्लेश] से (विध्यामि) छेदता हूँ, (एनम्) इस [कुमार्गी] को [अन्य विपत्तियों से] (विध्यामि) मैं छेदता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - कुमार्गी दुराचारी लोगईश्वरनियम से नाना विपत्तियाँ झेलते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(तेन) ईश्वरनियमेन (एनम्)कुमार्गिणम् (विध्यामि) विदारयामि। पीडयामि (अभूत्या) असम्पत्त्या (निर्भूत्या)हान्या (पराभूत्या) पराजित्या। पराभवेन (ग्राह्या) सन्धीनां रोगविशेषेण (तमसा)अन्धकारेण। महाक्लेशेन। अन्यत् पूर्ववत् ॥