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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे [ईश्वरनियम] (अमुष्मै) उस [कुपथ्यकारी] के लिये (अरायान्) क्लेशों, (दुर्णाम्नः) दुर्नामों [अर्श आदि रोगों] (सदान्वाः) सदा चिल्लानेवाली पीड़ाओं [रोग जिन में रोगीचिल्लाता है] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य ईश्वरनियमको छोड़कर कुपथ्य करतेहैं, वे अनेक महाक्लिष्ट रोग भोगते हैं॥७-९॥
टिप्पणी: ७−(ते) ईश्वरनियमाः (अमुष्मै) कुपथ्यसेविने (परा वहन्तु) दूरे प्रापयन्तु (अरायान्)श्रुदक्षिस्पृहिगृहिभ्य आय्यः। उ० ३।९६। ऋ हिंसायाम्-आय्य, यलोपः। क्लेशान् (दुर्णाम्नः) अ० ८।६।१। अर्शआदिरोगान् (सदान्वाः) अ० २।१४।१। सदा नोनुवाः।सर्वदा नोनूयमानाः शब्दायमानाः पीडाः ॥
