पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उषः=उषसः) उषा का (पतिः) पति [प्रभात उठनेवाला मनुष्य] (वाचः) वाणी के (पतिना) पति [विद्याभ्यासी]के साथ (संविदानः) मिला हुआ और (वाचः) वाणी का (पतिः) पति [विद्याभ्यासी पुरुष] (उषः=उषसः) उषा के (पतिना) पति [प्रभात उठनेवाले] के साथ (संविदानः) मिला हुआ [होवे] ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रभातवेलामें उठकर वेदादि शास्त्रों को विचारें और वेदादि शास्त्र विचारनेवाले प्रभातवेला में उठें, जिससे उनकी स्वस्थता और स्मृति बढ़ती रहे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(उषः)विभक्तिलोपः। उषसः। प्रभातवेलायाः (पतिः) पालकः पुरुषः (वाचः) वाण्याः (पतिना)पालकेन पुरुषेण (संविदानः) संगच्छमानः (वाचस्पतिः) विद्याभ्यासी पुरुषः (उषस्पतिना) प्रभातबोधनशीलेन (संविदानः) ॥
