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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) जिस [कुपथ्यकारी] से (द्विष्मः) हम [वैद्य लोग] वैर करते हैं, (च) और (यत्=यः) जो (नः) हम से (द्वेष्टि) बैर करता है, (तस्मै) उसको (एनत्) यह [कष्ट] (गमयामः) हमजताते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - वैद्य लोग कह दें किकुपथ्यकारी मनुष्य अवश्य कष्ट भोगेगा ॥४॥
टिप्पणी: ४−(यम्) कुपथ्यसेविनम् (द्विष्मः)वैरयामः, वयं वैद्याः (यत्) अव्ययम्। यः (च) (नः) अस्मान् वैद्यान् (द्वेष्टि)वैरयति (तस्मै) कुपथ्यसेविने (एनत्) कष्टम् (गमयामः) ज्ञापयामः ॥
