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उ॒षोयस्मा॑द्दुः॒ष्वप्न्या॒दभै॒ष्माप॒ तदु॑च्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उष: । यस्मात् । दु:ऽस्वप्न्यात् । अभैष्म । अप । तत् । उच्छतु ॥६.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रोगनाश करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (उषः) हे उषा ! [प्रभात वेला] (यस्मात्) जिस (दुःष्वप्न्यात्) दुष्ट स्वप्न में उठे कुविचार से (अभैष्म) हम डरे हैं, (तत्) वह (अप) दूर (उच्छतु) चला जावे ॥२॥
भावार्थभाषाः - यदि किसी कुपथ्य वारोग के कारण निद्राभङ्ग होकर मस्तक में कुविचार घूमने लगें, मनुष्य उसका प्रतीकारप्रभात ही अर्थात् बहुत शीघ्र करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(उषः) हे प्रभातवेले (यस्मात्) (दुःष्वप्न्यात्) दुष्टस्वप्ने भवात् कुविचारात् (अभैष्म) वयं भयं प्राप्तवन्तः (अप) दूरे (तत्) भयम् (उच्छतु) गच्छतु ॥