देवता: त्रिपदा यवमध्या गायत्री, आर्ची अनुष्टुप्
ऋषि: उषा,दुःस्वप्ननासन
छन्द: यम
स्वर: दुःख मोचन सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) इस [सब दुःख] को (अमुष्मै) उस [कुपथ्यसेवी] के लिये, (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! (देवाः) [तेरे] दिव्य नियम (परा वहन्तु) पहुँचावें, (यथा) जिस से (न साधुः) वह असाधुपुरुष (वध्रिः) निर्वीर्य और (विथुरः) व्याकुल (असत्) हो जावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य कुपथ्यसेवीहोवे, वह ईश्वरनियम के अनुसार दुष्ट कर्मों की अधिकता से श्रेष्ठ फल कभी नपावे, किन्तु दरिद्रता आदि महाक्लेशों में पड़कर घोर नरक भोगे ॥१०, ११॥
टिप्पणी: ११−(तत्)पूर्वोक्तं दुःखम् (अमुष्मै) तस्मै कुपथ्यसेविने (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूपपरमेश्वर (देवाः) दिव्यनियमाः (परा वहन्तु) प्रापयन्तु (वध्रिः) निर्वीर्यः (यथा) येन प्रकारेण (असत्) भूयात् (विथुरः) व्यथेः सम्प्रसारणं धः किच्च। उ०१।३९। व्यथ भयसंचलनयोः-उरच्, कित्। व्याकुलः (न साधुः) असाधुः। दुष्टजनः ॥
