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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अनागमिष्यतः) नआनेवाले (वरान्) वरदानों [श्रेष्ठ कर्मफलों] को, (अवित्तेः) निर्धनता के (संकल्पान्) विचारों को और (अमुच्याः) न छोड़नेवाले (द्रुहः) द्रोह [अनिष्ट, चिन्ता] के (पाशान्) फन्दों को ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य कुपथ्यसेवीहोवे, वह ईश्वरनियम के अनुसार दुष्ट कर्मों की अधिकता से श्रेष्ठ फल कभी नपावे, किन्तु दरिद्रता आदि महाक्लेशों में पड़कर घोर नरक भोगे ॥१०, ११॥
टिप्पणी: १०−(अनागमिष्यतः)अनागमनमिच्छतः (वरान्) श्रेष्ठफलान् (अवित्तेः) दरिद्रतायाः (संकल्पान्)विचारान् (अमुच्याः) मुच्लृ मोचने-क, ङीप्। अमोचनशीलायाः (द्रुहः)अनिष्टचिन्तायाः (पाशान्) बन्धान् ॥
