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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आलस्यादिदोष के त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्वप्न) हे स्वप्न ! [आलस्य] (ते) तेरे (जनित्रम्) जन्मस्थान को (विद्म) हम जानते हैं, तू (देवजामीनाम्) उन्मत्तों की गतियों का (पुत्रः) पुत्र और (यमस्य) मृत्यु का (करणः) करनेवाला (असि) है ॥८॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥८-१०॥
टिप्पणी: ८−(देवजामीनाम्) दिवुमदे-पचाद्यच्। नियो मिः। उ० ४।४३। या गतिप्रापणयोः-मि, आदेर्जत्वम्।देवानामुन्मत्तपुरुषाणां जामीनां यामीनां गतीनाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
