वांछित मन्त्र चुनें

स्वा॒सद॑सि सू॒षाअ॒मृतो॒ मर्त्ये॒श्वा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सुऽआसत् । असि । सुऽउषा : । अमृत: । मर्त्येषु । आ ॥४.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आयु की वृद्धि के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे आत्मा !] तू (स्वासत्) सुन्दर सत्तावाला, (सूषाः) सुन्दर प्रभातोंवाला [प्रभात के प्रकाश केसमान बढ़नेवाला] (आ) और (मर्त्येषु) मनुष्यों के भीतर (अमृतः) अमर (असि) है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य यह विचारतेहैं कि यह आत्मा जो बड़े पुण्यों के कारण इस मनुष्यशरीर में वर्तमान है, वहप्रभात के प्रकाश के समान उन्नतिशील और अमर अर्थात् नित्य और पुरुषार्थी है, वे संसार में बढ़ती करके यश पाते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(स्वासत्) सु+आस सत्तायाम्-शतृ।शोभनसत्तावान् (असि) हे आत्मन् त्वं भवसि (सूषाः) उषः किच्च। उ० ४।२३४। सु+उषदाहे-असि। शोभना उषसो यस्य सः। प्रभातवेलाप्रकाशतुल्यप्रवर्धमानः (अमृतः) अमरः।नित्यः पुरुषार्थी (मर्त्येषु) मनुष्येषु (आ) समुच्चये ॥