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बृह॒स्पति॑र्मआ॒त्मा नृ॒मणा॒ नाम॒ हृद्यः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृहस्पति: । मे । आत्मा । नृऽमना: । नाम । हृद्य: ॥३.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आयु की वृद्धि के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मेरा (आत्मा)आत्मा (बृहस्पतिः) बड़े गुणों का स्वामी, (नृमणाः) नेताओं के तुल्य मनवाला और (हृद्यः) हृदय का प्रिय (नाम) प्रसिद्ध [हो] ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य आत्मबल बढ़ाकरउत्तम गुण प्राप्त करें और वीर के समान पराक्रम करके सबके प्रिय हों॥५॥
टिप्पणी: ५−(बृहस्पतिः) महतां गुणानां पालकः (मे) मम (आत्मा) (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः (नाम) प्रसिद्धौ (हृद्यः) हृदयप्रियः ॥