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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु की वृद्धि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (विमोकः) विमुक्तकरनेवाला गुण (च च) और (आर्द्रपविः) गतिशोधक गुण (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्)दोनों न छोड़ें, (आर्द्रदानुः) याचकों का पालनेवाला गुण (च च) और (मातरिश्वा)ऐश्वर्य में बढ़नेवाला गुण (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों न छोड़ें ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दुःखों सेछूटकर उद्योग करें और अधिकारी याचकों का पालन करके वैभव बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(विमोकः)मुच्लृ मोचने-घञ् कुत्वं च। दुःखविमोचको गुणः (च) (मा) माम् (आर्द्रपविः)अर्देर्दीर्घश्च। उ० २।१८। अर्द गतौ याचने हिंसायां च-रक्+अच इः। उ० ४।१३९। पूञ्शोधने-इ प्रत्ययः। गतिशोधको गुणः (च) (मा हासिष्टाम्) न त्यजताम् (आर्द्रदानुः)अर्द याचने-रक्+दाभाभ्यां नुः। उ० ३।३२। देङ् पालने-नु। याचकपालको गुणः (मातरिश्वा) माता लक्ष्मीः, वैभवम्। श्वन्नुक्षन्पूषन्०। उ० १।१५९। मातरि+टुओश्वि गतिवृद्ध्योः-कनिन् डित्। मातरि वैभवे ऐश्वर्ये प्रवर्धको गुणः। अन्यत्पूर्ववत् ॥
