पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु की वृद्धि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उर्वः) शत्रुनाशक गुण [शूरपन] (च च) और (चमसः) भोजनपात्र [शरीर] (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों नछोड़ें, (धर्ता) धारण करनेवाला गुण (च च) और (धरुणः) अवस्थान [दृढ़ रहने का गुण] (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों न छोड़ें ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सङ्ग्रामरूपसंसार में शूर रहकर शरीररक्षा करते हुए शुभगुणों को धारण करें और स्थिर रक्खें॥३॥
टिप्पणी: ३−(उर्वः) उर्वी हिंसायाम्-अच्। उर्वति शूरयति मारयति शत्रून्। शूरत्वगुणः (च) (मा) माम् (चमसः) भोजनपात्रं शरीरम् (च) (मा हासिष्टाम्) न त्यजताम् (धर्ता)धारको गुणः (धरुणः) कॄवृदारिभ्य उनन्। उ० ३।५३। धृङ् अवस्थाने-उनन्। अवस्थानम्।दृढस्थितिगुणः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
