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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु की वृद्धि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रुजः) अन्धकारनाशकगुण (च च) और (वेनः) कमनीय गुण (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों न छोड़ें, (मूर्धा) मस्तक [मस्तकबल] (च च) और (विधर्मा) विविध प्रकार धारण करनेवाला आत्मा [आत्मबल] (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों कभी न छोड़ें ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अज्ञान के नाशसे अपने मस्तकबल अर्थात् विचार सामर्थ्य और आत्मबल को बढ़ाते रहें ॥२॥
टिप्पणी: २−(रुजः)रुजो भङ्गे-क। अन्धकारनाशको गुणः (च) (मा) माम् (वेनः) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ०३।६। अज गतिक्षेपणयोः-न, वीभावः, अथवा वी कान्त्यादिषु-न। प्रापणीयः कमनीयो वागुणः (च) (मा हासिष्टाम्) न त्यजताम् (मूर्धा) मस्तकसामर्थ्यम् (च) (मा) माम् (विधर्मा) विविधधारक आत्मा (च) (मा हासिष्टाम्) ॥
