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ऋषी॑णांप्रस्त॒रोऽसि॒ नमो॑ऽस्तु॒ दैवा॑य प्रस्त॒राय॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋषीणाम् । प्रऽस्तर: । असि । नम: । अस्तु । दैवाय । प्रऽस्तराय ॥२.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

इन्द्रियों की दृढ़ता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (ऋषीणाम्) इन्द्रियों का (प्रस्तरः) फैलानेवाला (असि) है, (दैवाय) दिव्य गुणवाले (प्रस्तराय) फैलाने [तुझ] को (नमः) नमस्कार [सत्कार] (अस्तु) होवे ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उस परमात्मा कोसदा धन्यवाद दें कि उसने उन वेदादि शास्त्र सुनने, विचारने और उपकार करने केलिये अमूल्य श्रवण आदि इन्द्रियाँ दी हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(ऋषीणाम्) सप्त ऋषयः प्रतिहिताःशरीरे षडिन्द्रियाणि। वि० सप्तमी-निरु० १२।३७। इन्द्रियाणाम् (प्रस्तरः)प्रस्तारकः। प्रसारकः परमेश्वरः (असि) (नमः) सत्कारः (अस्तु) (दैवाय) दिव्यगुणवते (प्रस्तराय) प्रसारकाय तुभ्यम् ॥