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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
इन्द्रियों की दृढ़ता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुश्रुतिः) शीघ्रसुनना (च च) और (उपश्रुतिः) अङ्गीकार करना (मा) मुझे (मा हासिष्टाम्) दोनों नछोड़ें, (सौपर्णम्) समस्त पूर्तिवाली (चक्षुः) दृष्टि और (अजस्रम्) अचूक (ज्योतिः) ज्योति [बनी रहे] ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ब्रह्मचर्य आदिके सेवन से अपने श्रवण इन्द्रियों को विकल न होने दें और ऐसा स्वस्थ रक्खें किवे अपने विषयों को पूर्ण रीति से शीघ्र अङ्गीकार कर लें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(सुश्रुतिः)शीघ्रश्रवणम् (च) (मा) माम् (उपश्रुतिः) विषयाणामङ्गीकारः (च) (मा हासिष्टाम्) ओहाक् त्यागे-लुङ्। न त्यजताम् (सौपर्णम्) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। सु+पॄपालनपूरणयोः-न, सुपर्णम्-अण्। बहुपूर्त्तियुक्तम् (चक्षुः) दृष्टिः (अजस्रम्)निरन्तरम् (ज्योतिः) तेजः ॥
