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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
इन्द्रियों की दृढ़ता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [मेरे] (कर्णौ) दोनोंकान (सुश्रुतौ) शीघ्र सुननेवाले, (कर्णौ) दोनों कान (भद्रश्रुतौ) मङ्गलसुननेवाले [होवें], (भद्रम्) मङ्गलमय (श्लोकम्) यश (श्रूयासम्) मैं सुना करूँ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रयत्न करकेअभ्यास करें कि वे कान आदि इन्द्रियों को सचेत रख कर श्रेष्ठ कर्मों के करने मेंशीघ्रता करते रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(सुश्रुतौ) श्रु-क्विप्। शीघ्रश्रोतारौ (कर्णौ) श्रोत्रे (भद्रश्रुतौ) मङ्गलश्रोतारौ (भद्रम्) मङ्गलमयम् (श्लोकम्) यशः (श्रूयासम्)आकर्णयासम् ॥
