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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
दुःख से छूटने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) हे सब विद्याओंमें व्यापक बुद्धिमानो ! (यः) जिस (अग्निः) व्यापक परमात्मा ने (वः) तुम में (आविवेश) प्रवेश किया है, (सः) वह (एषः) यह [परमात्मा] है, और (यत्) जो [शत्रुओंके लिये] (वः) तुम्हारा (घोरम्) भयानक रूप है, (तत्) वह (एतत्=एतस्मात्) इसी [परमात्मा] से है ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग उसजगदीश्वर को सर्वव्यापक और सर्वबलदायक समझकर बड़े महात्माओं के समान अधिकारी बनकर संसार में बड़े-बड़े काम करें ॥८, ९॥
टिप्पणी: ८−(यः) (वः) युष्मान् (आपः) हे सर्वविद्याव्यापिनो विपश्चितः-दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७। (अग्निः)व्यापकः परमेश्वरः (आ विवेश) प्रविष्टवान् (सः) परमात्मा (एषः) अत्र व्यापकः (यत्) (वः) युष्माकम् (घोरम्) भयानकं रूपम् (तत्) रूपम् (एतत्) अव्ययम्।एतस्मात्परमेश्वरात् ॥
