0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
दुःख से छूटने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इदम्) अब (तम्) उस [रोग] को (अति सृजामि) मैं नाश करता हूँ, (तम्) उस [रोग] को (मा अभ्यवनिक्षि)मैं कभी पुष्ट नहीं करूँ ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य हैकि जिन रोगों वा दोषों से आत्मा और शरीर में विकार होवे, उनको ज्ञानपूर्वकहटावें और कभी न बढ़ने दें ॥२-४॥
टिप्पणी: ४−(इदम्) इदानीम् (तम्) रोगम् (अतिसृजामि)अतिसर्जनं वधे दाने च। विनाशयामि (तम्) रोगम् (मा अभ्यवनिक्षि) णिजिर्शौचपोषणयोः-लुङ, अडभावः। नैव पुष्येयम् ॥
