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रु॒जन्प॑रिरु॒जन्मृ॒णन्प्र॑मृ॒णन् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रुजन् । परिऽरुजन् । मृणन् । प्रऽमृणन् ॥१.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

दुःख से छूटने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (रुजन्) तोड़ता हुआ, (परिरुजन्) सब ओर से तोड़ता हुआ, (मृणन्) मारता हुआ, (प्रमृणन्) कुचलता हुआ ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य हैकि जिन रोगों वा दोषों से आत्मा और शरीर में विकार होवे, उनको ज्ञानपूर्वकहटावें और कभी न बढ़ने दें ॥२-४॥
टिप्पणी: २−(रुजन्) विदारयन् (परिरुजन्) सर्वतो विदारयन् (मृणन्) मारयन् (प्रमृणन्) प्रकर्षेण नाशयन् ॥