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शि॒वेन॑ मा॒चक्षु॑षा पश्यतापः शि॒वया॑ त॒न्वोप॑ स्पृशत॒ त्वचं॑ मे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शिवेन । मा । चक्षुषा । पश्यत । आप: । शिवया । तन्वा । उप । स्पृशत । त्वचम् । मे ॥१.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:12


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

दुःख से छूटने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) हे विद्वानो ! (शिवेन) सुखप्रद (चक्षुषा) नेत्र से (मा) मुझे (पश्यत) तुम देखो, (शिवया) अपनेसुखप्रद (तन्वा) शरीर से (मे) मेरे (त्वचम्) शरीर को (उप स्पृशत) तुम सुख से छूओ॥१२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग कृपादृष्टि से मनुष्यों को देख कर अपने समान स्वस्थ और उपकारी बनावें ॥१२॥यह मन्त्रआ चुका है-अ० १।३३।४ ॥
टिप्पणी: १२−(शिवेन) सुखप्रदेन (मा) माम् (चक्षुषा) नेत्रेण (पश्यत)अवलोकयत (आपः) म० ८। हे विद्वांसः (शिवया) सुखप्रदेन (तन्वा) शरीरेण (उप) सुखेन (स्पृशत) (त्वचम्) शरीरम् (मे) मम ॥