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अति॑सृष्टो अ॒पांवृ॑ष॒भोऽति॑सृष्टा अ॒ग्नयो॑ दि॒व्याः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अतिऽसृष्ट: । अपाम् । वृषभ: । अतिऽसृष्ट: । अग्नय: । दिव्या: ॥१.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:16» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:1


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

दुःख से छूटने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अपाम्) प्रजाओं का (वृषभः) बड़ा ईश्वर [परमात्मा] (अतिसृष्टः) विमुक्त [छूटा हुआ] है, [जैसे] (दिव्याः) व्यवहारों में वर्तमान (अग्नयः) अग्नियाँ [सूर्य, बिजुली और प्रसिद्धअग्नि] (अतिसृष्टाः) विमुक्त हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - वह परमात्मा सब सृष्टिमें ऐसा स्वतन्त्र रम रहा है, जैसे सूर्य, बिजुली, अग्नि, वायु आदि संसार मेंनिरन्तर सर्वोपकारी हैं, सब मनुष्य उस जगदीश्वर की उपासना करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(अतिसृष्टः)स्वातन्त्र्येण विमुक्तः (अपाम्) आपः=आप्ताः प्रजाः-दयानन्दभाष्ये, यजुः० ६।२७।प्रजानाम् (वृषभः) वृषु सेचने परमैश्वर्ये च-अभच्, कित्। परमेश्वरः। सर्वस्वामी (अतिसृष्टाः) विमुक्ताः (अग्नयः) सूर्यविद्युत्प्रसिद्धाग्नयः (दिव्याः)व्यवहारेषु भवाः ॥