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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजधर्मकी व्यवस्था का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [विद्वान्]पुरुष (वै) निश्चय करके (सभायाः) सभा का (च च) और (समितेः) संग्रामव्यवस्था का (च) और (सेनायाः) सेना का (च) और (सुरायाः) राज्यलक्ष्मी का (प्रियम्) प्रिय (धाम) धाम [घर] (भवति) होता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा कीव्यवस्था जानकर सभा आदि की यथावत् संस्था करते हैं, वे राज्यलक्ष्मी बढ़ा करकीर्ति पाते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−उपरि व्याख्यातं यथोचितं योजनीयम् ॥
