0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजधर्मकी व्यवस्था का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सभा) सभा (च च) और (समितिः) संग्राम व्यवस्था (च) और (सेना) सेना (च) और (सुरा) राज्यलक्ष्मी (तम्)उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछे विचरे ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की विहितव्यवस्था से ही संसार में सभा आदि की संस्था स्थापित हुई है ॥२॥इस मन्त्र काकुछ अंश महर्षिदयानन्दकृत सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ६ राजधर्मप्रकरण तथासंस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: २−(तम्) व्रात्यं परमात्मानम् (सभा) राजधर्मादिसभा (समितिः) संग्रामः-निघ० २।१७। संग्रामव्यवस्था (सेना) (सुरा) षुर दीप्तौ ऐश्वर्ये च-क, टाप्। राज्यलक्ष्मीः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
