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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की प्रभुता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [विद्वान्पुरुष] (वै) निश्चय करके (सबन्धूनाम्) बन्धुओं सहित (विशाम्) मनुष्यों का (च च)और (अन्नस्य) अन्न [जौ चावल आदि] का (च च) और (अन्नाद्यस्य) अनाज [रोटी पूरी आदिबने हुए पदार्थ] का (प्रियम्) प्रिय (धाम) धाम [घर] (भवति) होत है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् मनुष्यपरमात्मा का आश्रय लेकर पुरुषार्थ करता है, वह सर्वहितकारी होने से सब मेंप्रतिष्ठा पाता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(विशाम्) मनुष्याणाम् (च) (वै) निश्चयेन (सः) विद्वान् (सबन्धूनाम्) सकुटुम्बिनाम् (अन्नस्य) सस्यस्य (अन्नाद्यस्य) भोग्यस्यसंस्कृतपदार्थस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
