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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्माकी व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) उस [विद्वान्]पुरुष को (आपः) सत्कर्म (आ) आकर (गच्छति) मिलता है, (एनम्) उस को (श्रद्धा)श्रद्धा [धर्म में प्रतीति] (आ) आकर (गच्छति) मिलती है, (एनम्) उसको (वर्षम्)श्रेष्ठपन (आ) आकर (गच्छति) मिलता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य परमात्मा कोजान लेता है, तब वह सुकर्मी श्रद्धावान् और श्रेष्ठ होकर उन्नति करता है॥३॥
टिप्पणी: ३−(आ) आगत्य (एनम्) विद्वांसं पुरुषम् (आपः) म० २। सुकर्म (गच्छति)प्राप्नोति। अन्यद् गतं स्पष्टं च-म० २ ॥
