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स उ॑त्त॒मांदिश॒मनु॒ व्यचलत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । उत्ऽतमाम् । दिशम् । अनु । वि । अचलत् ॥६.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (उत्तमाम्) अत्यन्त ऊँची (दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वेदों मेंप्रतिपादित ईश्वरीय ज्ञान को ऊँचे से ऊँचे स्थान में साक्षात् करके उन्नति करताहुआ मोक्षानन्द भोगता है ॥७, ८, ९॥
टिप्पणी: ७−(सः) व्रात्यः (उत्तमाम्) अतिशयेनोन्नताम्। अन्यद् गतम् ॥