वांछित मन्त्र चुनें

ससर्वा॑नन्तर्दे॒शाननु॒ व्यचलत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । सर्वान् । अन्त:ऽदेशान् । अनु । वि । अचलत् ॥६.२४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:24


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (सर्वान्) सब (अन्तर्देशान् अनु) भीतरी देशों की ओर (वि अचलत्) विचरा॥२४॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् पुरुषगहरे विचार से यह देखते हैं कि संसार में सब लोग परब्रह्म परमात्मा की आज्ञामानने से बड़े हुए हैं, वे ही ईश्वर की आज्ञा में रहकर उन्नति करते और आनन्दभोगते हैं ॥२४-२६॥
टिप्पणी: २४-२६−(सः) व्रात्यःपरमात्मा (अन्तर्देशान्) मध्यदेशान् (तम्) व्रात्यम् (प्रजापतिः) प्रजापालकोराजा (परमेष्ठी) उच्चपदस्थ आचार्यः संन्यासी वा (पिता) जनकः (पितामहः) पितुःपिता। अन्यत् पूर्ववद् यथोचितं योजनीयं च ॥