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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (दिशः अनु) सब दिशाओं की ओर (वि अचलत्) विचरा, (विराट्) विराट् [विविधपदार्थों से प्रकाशमान ब्रह्माण्डरूप संसार] (तम् अनु) उस [व्रात्य परमात्मा] केपीछे (वि अचलत्) विचरा, (च) और (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यपदार्थ (च) और (सर्वाः)सब (देवताः) दिव्य शक्तियाँ [उसके पीछे विचरीं] ॥२२॥
भावार्थभाषाः - यह संसार, दिव्यपदार्थऔर उनकी दिव्यशक्तियाँ परमात्मा से सब दिशाओं में प्रसिद्ध हुई हैं, उस परमात्माको साक्षात् करनेवाला मनुष्य सब उत्तम पदार्थों और गुणों का विवेकी होकर संसारका प्रिय होता है ॥२२, २३॥
टिप्पणी: २२, २३−(सः) व्रात्यः (दिशः) सर्वाः दिशाः (तम्) व्रात्यम् (विराट्) वि+राजृ दीप्तौ-क्विप्।विविधपदार्थैः प्रकाशमानो ब्रह्माण्डरूपसंसारः (देवाः) दिव्यपदार्थाः (देवताः)दिव्यशक्तयः। अन्यत् पूर्ववद् यथावद् योजनीयञ्च ॥
